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चन्द्रकान्ता – देवकीनन्दन खत्री रचित उपन्यास

( तीसरा अध्याय )

तीसरा बयान

      कल रात से आज की रात कुमार को और भारी गुजरी। बार-बार उस बरवे को पढ़ते रहे। सवेरा होते ही उठे, स्नान पूजा कर जंगल में जाने के लिए तेजसिंह को बुलाया, वे भी आए। आज फिर तेजसिंह ने मना किया मगर कुमार ने न माना, तब तेजसिंह ने उन तिलिस्मी फूलों में से गुलाब का फूल पानी में घिस कर कुमार और फतहसिंह को पिलाया और कहा कि अब जहाँ जी चाहे घूमिए कोई बेहोश करके आपको नहीं ले जा सकता, हाँ जबर्दस्ती पकड़ ले तो मैं नहीं कह सकता।

      कुमार ने कहा, “ऐसा कौन है जो मुझको जबर्दस्ती पकड़ ले!”

       पाँचों आदमी जंगल में गए, कुछ दूर पर कुमार और फतहसिंह को छोड़ तीनों ऐयार अलग-अलग हो गए। कुँअर वीरेन्द्रसिंह फतहसिंह के साथ इधर-उधर घूमने लगे। घूमते-घूमते कुमार बहुत दूर निकल गए, देखा कि दो नकाबपोश सवार सामने से आ रहे हैं। जब कुमार से थोड़ी दूर रह गए तो एक सवार घोड़े से उतर पड़ा और जमीन पर कुछ रख के फिर सवार हो गया। कुमार उसकी तरफ बढ़े, जब पास पहुँचे तो वे दोनों सवार यह कह के चले गए कि “इस किताब और चिट्ठी को ले लीजिए।”

       कुमार ने पास जाकर देखा तो वही तिलिस्मी किताब नजर पड़ी, उसके ऊपर एक चिट्ठी और बगल में कलम दवात और कागज भी मौजूद पाया। कुमार ने खुशी-खुशी उस किताब को उठा लिया और फतहसिंह की तरफ देखके बोले, “यह किताब देकर दोनों सवार चले क्यों गए सो कुछ समझ में नहीं आता, मगर बोली से मालूम होता है कि वह सवार औरत है जिसने मुझे किताब उठा लेने के लिए कहा। देखें चिट्ठी में क्या लिखा है?”

       यह कह चीठी खोल पढ़ने लगे, यह लिखा था -
       “मेरा जी तुमसे अटका है और जिसको तुम चाहते हो वह बेचारी तिलिस्म में फँसी है। अगर उसको किसी तरह की तकलीफ होगी तो तुम्हारा जी दुखी होगा। तुम्हारी खुशी से मुझको भी खुशी है यह समझ कर किताब तुम्हारे हवाले करती हूँ। खुशी से तिलिस्म तोड़ो और चन्द्रकान्ता को छुड़ाओ, मगर मुझको भूल न जाना, तुम्हें उसी की कसम जिसको ज्यादा चाहते हो। इस चिट्ठी का जवाब लिखकर उसी जगह रख देना जहाँ से किताब उठाओगे।”

       चिट्ठी पढ़कर कुमार ने तुरत जवाब लिखा -
       “इस तिलिस्मी किताब को हाथ में लिए मैंने जिस वक्त तुमको देखा उसी वक्त से तुम्हारे मिलने को जी तरस रहा है। मैं उस दिन अपने को बड़ा भाग्यवान जानूँगा जिस दिन मेरी आँखें दोनों प्रेमियों को देख-देख ठण्डी होगी, मगर तुमको तो मेरी सूरत से नफरत है।– तुम्हारा वीरेन्द्र।”

      जवाब लिख कर कुमार ने उसी जगह पर रख दिया। वे दोनों सवार दूर खड़े दिखाई दिए, कुमार देर तक खड़े राह देखते रहे मगर वे नजदीक न आए, जब कुमार कुछ दूर हट गए तब उनमें से एक ने आकर चिट्ठी का जवाब उठा लिया और देखते-देखते नजरों की ओट हो गया। कुमार भी फतहसिंह के साथ लश्कर में आए।

       कुछ रात गए तेजसिंह वगैरह भी वापस आकर कुमार के खेमे में इकट्ठे हए। तेजसिंह ने कहा, “आज भी किसी का पता न लगा। हाँ, कई नकाबपोश सवारों को इधर-उधर घूमते जरूर देखा। मैंने चाहा कि उनका पता लगाऊँ मगर न हो सका क्योंकि वे लोग भी चालाकी से घूमते थे, मगर कल जरूर हम उन लोगों का पता लगा लेंगे।”

       कुमार ने कहा, “देखो तुम्हारे किए कुछ न हुआ मगर मैंने कैसी ऐयारी की कि खोई हुई चीज को ढूँढ निकाला, देखो यह तिलिस्मी किताब।” यह कह कुमार ने किताब तेजसिंह के आगे रख दी।

       तेजसिंह ने कहा, “आप जो कुछ ऐयारी करेंगे वह तो मालूम ही है मगर यह बताइए कि किताब कैसे हाथ लगी? जो बात होती है ताज्जुब की होती है!”

       कुमार ने बिल्कुल हाल किताब पाने का कह सुनाया, तब वह चिट्ठी दिखाई और जो कुछ जवाब लिखा था वह भी कहा।

       ज्योतिषीजी ने कहा, “क्यों न हो, फिर तो बड़े घर की लड़की है, किसी तरह से कुमार को दुख देना पसन्द न किया सिवाय इसके चिट्ठी पढ़ने से यह भी मालूम होता है कि वह कुमार के पूरे-पूरे हाल से वाकिफ है, मगर हम लोग बिल्कुल नहीं जान सकते कि यह है कौन?”

       कुमार ने कहा, “इसकी शर्म तो तेजसिंह की होनी चाहिए कि इतने बड़े ऐयार होकर दो-चार औरतों का पता नहीं लगा सकते।”

       तेज – पता तो ऐसा लगावेंगे कि आप भी खुश हो जायेंगे, मगर अब किताब मिल गई है तो पहिले तिलिस्म के काम से छुट्टी पा लेना चाहिए।

       कुमार – तब तक क्या वे सब बैठी रहेंगी?

       तेज – क्या अब आपको कुमारी चन्द्रकान्ता की फिक्र न रही?

       कुमार – क्यों नहीं, कुमारी की मुहब्बत भी मेरे नस नस में घुसी हुई है मगर तुम तो इंसाफ करो कि इसकी मुहब्बत मेरे साथ कैसी सच्ची है, यहाँ तक कि मेरे ही सबब से कुमारी चन्द्रकान्ता को मुझसे भी बढ़ के समझ रक्खा है।

       तेज – हम यह तो नहीं कहते कि उसकी मुहब्बत की तरफ खयाल न करें, मगर तिलिस्म का भी तो खयाल होना चाहिए।

       कुमार – तो ऐसा करो जसमें दोनों का काम चले।

       तेज – ऐसा ही होगा, दिन को तिलिस्म तोड़ने का काम करेंगे, रात को उन लोगों का पता लगावेंगे।

     आज की रात फिर उसी तरह काटी, सवेरे मामूली कामों से छुट्टी पाकर कुँअर वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और ज्योतिषीजी तिलिस्म में घुसे, तिलिस्मी किताब साथ थी। जैसे-जैसे उसमें लिखा हुआ था उसी तरह से लोग तिलिस्म तोड़ने लगे।

       तिलिस्मी किताब में पहिले ही यह लिखा हुआ था कि तिलिस्म तोड़ने वाले को चाहिए कि जब पहर दिन बाकी रहे तिलिस्म से बाहर हो जाय और उसके बाद कोई काम तिलिस्म तोड़ने का न करे।

*–*–*

चौथा बयान

      तिलिस्मी खण्डहर में घुसकर पहले वे उस दालान में गए जहाँ पत्थर के चबूतरे पर पत्थर ही का आदमी सोया हुआ था। कुमार ने इसी जगह से तिलिस्म तोड़ने में हाथ लगाया।

       जिस चबूतरे पर पत्थर का आदमी सोया था उसके सिरहाने की तरफ पाँच हाथ हटकर कुमार ने अपने हाथ से जमीन खोदी। गज भर खोदने के बाद एक सफेद पत्थर की चट्टान देखी जिसमें उठाने के लिए लोहे की मजबूत कड़ी लगी हुई भी दिखाई पड़ी। कड़ी में हाथ डाल के पत्थर उठाकर बाहर किया। तहखाना मालूम पड़ा, जिसमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी थीं। तेजसिंह ने मशाल जला ली, उसी की रोशनी में सब कोई नीचे उतरे। खूब खुलासा कोठरी देखी, कहीं गर्द या कूडे का नाम-निशान नहीं, बीच में संगमरमर पत्थर की खूबसूरत पुतली एक हाथ में काँटी दूसरे हाथ में हथौड़ी लिए खड़ी थी। कुमार ने उसके हाथ से हथौड़ी-काँटी लेकर उसी के बाएँ कान में काँटी डाल हथौड़ी से ठोक दी, साथ ही उस पुतली के होंठ हिलने लगे और उसमें से बाजे की-सी आवाज आने लगी, मालूम होता था मानो वह पुतली गा रही है।

       थोड़ी देर तक यही कैफियत रही, यकायक पुतली के बाएँ-दाहिने दोनों अंग के दो टुकड़े हो गये और उसके पेट में से आठ अंगुल का छोटा-सा गुलाब का पेड़ जिसमें कई फूल भी लगे हुए थे और डाल में एक ताली लटक रही थी निकला, साथ ही इसके एक छोटा-सा ताँबे का पत्र भी मिला जिस पर कुछ लिखा हुआ था। कुमार ने उसे पढ़ा-

       “इस पेड़ को हमारे यहाँ के वैद्य अजायबदत्त ने मसाले से बनाया है। इन फूलों से बराबर गुलाब की खुशबू निकलकर दूर-दूर तक फैला करेगी। दरबार में रखने के लिए यह एक नायाब पौधा सौगात के तौर पर वैद्यजी ने तुम्हारे वास्ते रखा है।”

       इसको पढ़कर कुमार बहुत खुश हुए और ज्योतिषीजी की तरफ देखकर बोले, ”यह बहुत अच्छी चीज मुझको मिली, देखिये इस वक्त भी इन फूलों में से कैसी अच्छी खुशबू निकलकर फैल रही है।”

       तेज - इसमें तो कोई शक नहीं।

       देवी - एक से एक बढ़कर कारीगरी दिखाई पड़ती है!

       अभी कुमार बात कर रहे थे कि कोठरी के एक तरफ का दरवाजा खुल गया। अंधेरी कोठरी में अभी तक इन लोगों ने कोई दरवाजा या उसका निशान नहीं देखा था पर इस दरवाजे के खुलने से कोठरी में बखूबी रोशनी पहुँची। मशाल बुझादी गई और ये लोग उस दरवाजे की राह से बाहर हुए। एक छोटा-सा खूबसूरत बाग देखा। यह बाग वही था जिसमें चपला आई थी और जिसका हाल हम दूसरे भाग में लिख चुके हैं।

      बमूजिब लिखे तिलिस्मी किताब के कुमार ने उस ताली में एक रस्सी बाँधी जो पुतली के पेट से निकली थी। रस्सी हाथ में थाम ताली को जमीन में घसीटते हुए कुमार बाग में घूमने लगे।

       हर एक रविशों और क्वारियों में घूमते हुए एक फव्वारे के पास ताली जमीन से चिपक गई। उसी जगह ये लोग भी ठहर गये। कुमार के कहे मुताबिक सबों ने उस जमीन को खोदना शुरू किया। दो-तीन हाथ खोदा था कि ज्योतिषीजी ने कहा, “अब पहर भर दिन बाकी रह गया, तिलिस्म से बाहर होना चाहिए।”

       कुमार ने ताली उठा ली और चारों आदमी कोठरी की राह से होते हुए ऊपर चढ़ के उस दालान में पहुँचे जहाँ चबूतरे पर पत्थर का आदमी सोया था, उसके सिरहाने की तरफ जमीन खोदकर जो पत्थर की चट्टान निकली थी उसी को उलटकर तहखाने के मुँह पर ढांप दिया। उसके दोनों तरफ उठाने के लिए कड़ी लगी हुई थी, और उलटी तरफ एक ताला भी बना हुआ था। उसी ताली से जो पुतली के पेट से निकली थी यह ताला बंद भी कर दिया।

       चारों आदमी खण्डहर से निकल कुमार के खेमे में आये। थोड़ी देर आराम कर लेने के बाद तेजसिंह, देवीसिंह और ज्योतिषीजी कुमार से कह के वनकन्या की टोह में जंगल की तरफ रवाना हुए। इस समय दिन अनुमानत: दो घण्टे बाकी होगा।

       ये तीनों ऐयार थोड़ी ही दूर गये होंगे कि एक नकाबपोश जाता हुआ दिखा। देवीसिंह वगैरह पेड़ों की आड़ दिये उसी के पीछे-पीछे रवाना हुए। वह सवार कुछ पश्चिम हटता हुआ सीधे चुनार की तरफ जा रहा था। कई दफे रास्ते में रुका, पीछे फिरकर देखा और बढ़ा। सूरज अस्त हो गया। अंधेरी रात ने अपना दखल कर लिया, घना जंगल अंधेरी रात में डरावना मालूम होने लगा। अब ये तीनों ऐयार सूखे पत्तो की आवाज पर जो टापों के पड़ने से होती थी जाने लगे। घंटे भर रात जाते-जाते उस जंगल के किनारे पहुँचे।

       नकाबपोश सवार घोड़े पर से उतर पड़ा। उस जगह बहुत से घोड़े बँधे थे। वहीं पर अपना घोड़ा भी बाँध दिया, एक तरफ घास का ढेर लगा हुआ था, उसमें से घास उठाकर घोड़े के आगे रख दी और वहाँ से पैदल रवाना हुआ।

       उस नकाबपोश के पीछे-पीछे चलते हुए ये तीनों ऐयार पहर रात बीते गंगा किनारे पहुँचे। दूर से जल में दो रोशनियाँ दिखाई पड़ीं, मालूम होता था जैसे दो चन्द्रमा गंगाजी में उतर आये हैं। सफेद रोशनी जल पर फैल रही थी। जब पास पहुँचे देखा कि एक सजी हुई नाव पर कई खूबसूरत औरतें बैठी हैं, बीच में ऊँची गद्दी पर एक कमसिन नाजुक औरत जिसका रोआब देखने वालों पर छा रहा है बैठी है, चाँद-सा चेहरा दूर से चमक रहा है। दोनों तरफ माहताब जल रहे हैं।

       नकाबपोश ने किनारे पहुँच कर जोर से सीटी बजाई, साथ ही उस नाव में से इस तरह सीटी की आवाज आई जैसे किसी ने जवाब दिया हो। उन औरतों में से जो उस नाव पर बैठी थीं दो औरतें उठ खड़ी हुईं तथा नीचे उतर एक डोंगी जो उस नाव के साथ बँधी थी, खोलकर किनारे ला नकाबपोश को उस पर चढ़ा ले गयीं।

      अब ये तीनों ऐयार आपस में बातेंकरने लगे-
       तेज - वाह, इस नाव पर छूटते हुए दो माहताबों के बीच ये औरतें कैसी भली मालूम होती हैं।

       ज्योतिषी - परियों का अखाड़ा मालूम होता है, चलो तैर के उनके पास चलें।

       देवी - ज्योतिषीजी, कहीं ऐसा न हो कि परियाँ आपको उड़ा ले जायं, फिर हमारी मण्डली में एक दोस्त कम हो जायगा।

       तेज - मैं जहाँ तक ख्याल करता हूं यह उन्हीं लोगों की मण्डली है जिन्हें कुमार ने देखा था।

       देवी - इसमें तो कोई शक नहीं।

       ज्योतिषी - तो तैर के चलते क्यों नहीं? तुम तो जल से ऐसा डरते हो जैसे कोई बुड्ढ़ा आफियूनी डरता हो।

       देवी - फिर तुम्हारे साथ आने से क्या फायदा हुआ? तुम्हारी तो बड़ी तारीफ सुनते थे कि ज्योतिषीजी ऐसे हैं, वैसे हैं, पहिया हैं, चर्खे हैं मगर कुछ नहीं, एक अदनी-सी मण्डली का पता नहीं लगा सकते।

       ज्योतिषी - मैं क्या खाक बताऊँ? वे लोग तो मुझसे भी ज्यादे ओस्ताद मालूम होती हैं! सबों ने अपने-अपने नाम ही बदल दिये हैं, असल नाम का पता लगाना चाहते हैं तो अजीब-गरीब नामों का पता लगता है। किसी का नाम वियोगिनी, किसी का नाम योगिनी, किसी का भूतनी किसी का डाकिनी, भला भताइये क्या मैं मान लूँ कि इन लोगों के यही नाम हैं?

       तेज - तो इन लोगों ने अपना नाम क्यों बदल लिया?

       ज्योतिषी - हम लोगों को उल्लू बनाने के लिए।

       देवी - अच्छा नाम जाने दीजिये इनके मकाम का पता लगाइये।

       ज्योतिषी - मकाम के बारे में जब रमल से दरियाफ्त करते हैं तो मालूम होता है कि इन लोगों का मकाम जल में है, तो क्या हम समझ लें कि ये लोग जलवासी अर्थात् मछली हैं।

       तेज - यह तो ठीक ही है, देखिए जलवासी हैं कि नहीं?

       ज्योतिषी - भाई सुनो, रमल के काम में ये चारों पदार्थ-हवा, पानी, मिट्टी और आग हमेशा विघ्न डालते हैं। अगर कोई आदमी ज्योतिषी या रम्माल को छकाना चाहे तो इन चारों के हेर-फेर से खूब छकाया जा सकता है। ज्योतिषी बेचारा खाक न कर सके, पोथी-पत्र बेकार का बोझ हो जाय।

       तेज - यह कैसे? खुलासा बताओ तो कुछ हम लोग भी समझें, वक्त पर काम ही आवेगा।

       ज्योतिषी - बता देंगे, इस वक्त जिस काम को आये हो वह करो। चलो तैरकर चलें।

       तेज - चलो।

       ये तीनों ऐयार तैरकर नाव के पास गये। बटुआ ऐयारी का कमर में बाँधा कपड़ा-लत्ता किनारे रखकर जल में उतर गये। मगर दो-चार हाथ गये होंगे कि पीछे से सीटी की आवाज आई, साथ ही नाव पर जो माहताब जल रहे थे बुझ गये, जैसे किसी ने उन्हें जल्दी से जल में फेंक दिया हो। अब बिल्कुल अंधेरा हो गया, नाव नजरों से छिप गई। देवीसिंह ने कहा, “लीजिए, चलिए तैर के!”

       तेज - ये सब बड़ी शैतान मालूम होती हैं?

       ज्योतिषी - मैंने तो पहले ही कहा कि ये सब की सब आफत हैं, अब आपको मालूम हुआ न कि मैं सच कहता था, इन लोगों ने हमारे नजूम को मिट्टी कर दिया है।

       देवी - चलिये किनारे, इन्होंने तो बेढब छकाया, मालूम होता है कि किनारे पर कोई पहरे वाला खड़ा देखता था। जब हम लोग तैर के जाने लगे उसने सीटी बजाई, बस अधेरा हो गया, पहले ही से इशारा बँधा हुआ था।

       ज्योतिषी - इस नालायक को यह क्या सूझी कि जब हम लोग पानी में उतर चुके तब सीटी बजाई, पहले ही बजाता तो हम लोग क्यों भीगते?

      ये तीनो ऐयार लौटकर किनारे आये, पहिरने के वास्ते अपना कपड़ा खोजते हैं तो मिलता ही नहीं।

      देवी - ज्योतिषीजी पालागी, लीजिए कपड़े भी गायब हो गये! हाय इस वक्त अगर इन लोगों में से किसी को पाऊँ तो कच्चा ही चबा जाऊँ।

      तेज - हम तो उन लोगों की तारीफ करेंगे, खूब ऐयारी की।

      देवी - हाँ-हाँ खूब तारीफ कीजिए जिससे उन लोगों में से अगर कोई सुनता हो तो अब भी आप पर रहम करे और आगे न सतावे।

      ज्योतिषी - अब क्या सताना बाकी रह गया! कपड़े तक तो उतरवा लिये!

      तेज - चलिए अब लश्कर में चलें, इस वक्त और कुछ करते बन न पड़ेगा।

      आधी रात जा चुकी होगी जब ये लोग ऐयारी के सताये बदन से नंग-धड़ंग कांपते-कलपते लश्कर की तरफ रवाना हुए।

*–*–*


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